- पुरुष बेली डांसरों पर समाज का तंज, तिरस्कार और हिंसा का दर्दभरा किस्सा।
- राहुल, अभिषेक और तुषार की संघर्ष से स्टारडम तक की प्रेरणादायक यात्रा।
- परिवार, समाज और सोशल मीडिया की नफरत के बीच खुद की पहचान खोजने की कहानी।
- भारत में बेली डांस की बढ़ती पहचान और जेंडर की बंदिशों पर बड़े सवाल।
घर-गली की चाय की दुकानों पर अक्सर लोग बड़ी शिद्दत से दूसरों की जिंदगी के फैसले ले लेते हैं। किसी का करियर तय कर देते हैं, किसी की मर्दानगी पर टिप्पणी कर देते हैं। एक पुरुष अगर “belly dance” जैसे शब्द बोल दे, तो आधे लोग तो चाय की चुस्की छोड़कर हैरान नज़र आते हैं। हालांकि इस आर्ट फॉर्म में वही ग्रेस है, वही आत्मीयता है, जो किसी भी क्लासिकल डांस में होती है।
भारत के तीन पुरुष बेली डांसर—राहुल, अभिषेक और तुषार—अपनी कहानी में यही दिखाते हैं कि कला सिर्फ कला है, उस पर जेंडर का ठप्पा लगाना गलत है।
राहुल गुप्ता: कमर की लचक पर उठे सवाल और हिम्मत की नई उड़ान
बचपन का सपना जो रास्ता बदलता गया
पांच साल के एक छोटे बच्चे की कल्पना कीजिए, जो कथक की थाप पर नन्हे कदम रखता है। राहुल के अंदर नृत्य का बीज वहीं पड़ा। उनकी मां ने सपनों में रंग भरे और कहा—“डांस करो, जहां मन लगे, वहीं जाओ।”
राहुल कई डांस फॉर्म आजमाते रहे, पर आत्मा को चैन कहीं नहीं मिला। टीवी पर पहली बार बेली डांस देखकर जैसे किसी ने भीतर की खिड़की खोल दी। लगता था कि यह वह डांस है जो उनके अंदर की वह खूबसूरती बाहर ला सकता है जो उन्हें खुद भी समझ नहीं आती थी।
टीचर की तलाश और परिवार का संघर्ष
टीचर ढूंढना किसी मिशन जैसा था। राहुल ने टीवी और यूट्यूब से सीखना शुरू किया। शुक्र यह रहा कि मां मानसिकता की दीवारों से ऊपर उठ चुकी थीं। उन्होंने बेटे को बच्चा समझा, लड़का नहीं। यही सबसे बड़ी ताकत थी।
पिता का विरोध और घर से निकाले जाने की घटना
रियलिटी शो में एक परफॉर्मेंस ने जैसे घर की दीवारें हिला दीं। शो के बाद कुछ रिश्तेदार-टाइप सलाहकारों ने पिता से कहा—
“ये क्या करवा रहे हो अपने बेटे से? लड़कियों वाला डांस!”
इस एक वाक्य ने पिता के भीतर के डर, समाज की नज़रों और अपनी सोच को इतना हिला दिया कि गुस्से में राहुल को घर से निकाल दिया गया।
राहुल कहते हैं—
“चेहरे पर मायूसी थी, पर हिम्मत नहीं टूटी। कसम खाई कि एक दिन बेहतरीन बेली डांसर बनकर दिखाऊंगा।”
गुरुग्राम: गालियों की बरसात और सपनों की तपस्या
गुरुग्राम पहुंचकर राहुल ने पूरी ताकत झोंक दी। पर शहर ने भी कम इम्तिहान नहीं लिए। सड़क पर निकलते ही ताने—
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“छक्का जा रहा है”
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“नचनिया”
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और कई शब्द जो यहां लिखना मुश्किल है…
कई बार तो लगता था कि शायद लोग सही कह रहे हैं। खुद को गलत मानने की स्थिति तक पहुंच गए। सोशल मीडिया ने तो जैसे आग में घी डाल दिया। वायरल वीडियो पर मीम, गालियाँ और मौत तक की धमकियाँ।
डिप्रेशन और फिर एक नया जन्म
डेढ़ साल तक डिप्रेशन ने उन्हें जकड़े रखा। एक मनोचिकित्सक ने कहा—
“डांस मत छोड़ो। यही तुम्हें बचाएगा।”
उस दिन जैसे राहुल का नया जन्म हुआ। स्टेज पर लौटे और अब दुनिया भर के छात्रों को बेली डांस सिखा रहे हैं। उनकी मुस्कान में आज वही चमक है, जो कभी टीवी पर बेली डांसर देखकर आई थी।
अभिषेक की कहानी: खूबसूरती से भरे मूव्स और एक दर्दनाक रात
पहचानी हुई धुन और एक नया रास्ता
हिमाचल के अभिषेक पहले फ्रीस्टाइल और हाउस डांस करते थे। पर एक दिन महिलाओं का बेली डांस देख ऐसा लगा मानो धुन ने हाथ पकड़कर कहा—“चलो, यही रास्ता तुम्हारा है।”
मध्य-पूर्वी म्यूजिक बजते ही उनका शरीर खुद लय पकड़ने लगता। यही एहसास उन्हें आगे खींचता गया।
जानलेवा हमला: वह रात जिसने रूह हिला दी
अभिषेक की कहानी यहां सीधी नहीं चलती। एक रात आठ लड़कों ने सिर्फ इसलिए हमला किया, क्योंकि उन्हें पता था कि वह बेली डांसर हैं।
उन्होंने:
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कपड़े फाड़ दिए
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एक किलोमीटर तक घसीटा
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सेक्सुअल हैरेसमेंट किया
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और कहा—“तुम जैसे लोग समाज की गंदगी हो”
ये पल किसी भी इंसान को तोड़ सकते थे। मगर अभिषेक ने हार नहीं मानी।
सोशल मीडिया की कड़वाहट और शरीर पर टिप्पणियाँ
इंस्टाग्राम पर वीडियो डालते ही आते थे कमेंट—
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“तुम पर ये डांस सूट नहीं करता”
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“बहुत भद्दे लगते हो”
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“तुम मर्द ही नहीं लगते”
फिर भी उन्होंने तय किया कि ये दुनिया उन्हें नहीं रोक पाएगी।
आज का जीवन: आर्ट, कॉर्पोरेट और आत्मविश्वास
अभिषेक आज इंफोसिस में फाइनेंशियल एडवाइज़र हैं और साथ में बेली डांस की वर्कशॉप्स करते हैं। जिन लोगों ने तिरस्कार झेला है, उनके साथ रहकर एक दूसरे का हौसला बढ़ाते हैं।
तुषार रॉय: कोलकाता का युवा जो डांस में अपनी पहचान ढूंढ रहा है
डॉक्टर-इंजीनियर वाली सोसाइटी में एक डांसर
तुषार बताते हैं कि जिस माहौल में वे पले, वहां करियर की परिभाषा सिर्फ दो शब्द थे—डॉक्टर या इंजीनियर। पर तुषार का मन डांस के लिए धड़कता था।
रिहर्सल में पहली बार जब उन्होंने बेली मूव किए, तो लोगों ने तुरंत रोक दिया—
“ये लड़कियों का स्टेप है!”
ये बातें तुषार के दिल तक उतर गईं, पर उनकी जिज्ञासा भी वहीं से शुरू हुई।
रानी मुखर्जी के गाने से शुरू हुआ मोड़
10वीं के बाद जब ‘अगा बाई’ गाना आया और रानी मुखर्जी ने बेली डांस किया, तब तुषार ने खुद को उसी राह पर पाया। उनके मूव्स कॉपी किए और पहली बार लोगों ने कहा—
“तू तो ग़ज़ब कर गया!”
पहली तारीफ ही कभी-कभी पूरा जीवन बदल देती है।
ट्रेनिंग, सफर और हिम्मत
तुषार ने टीचर ढूंढ़ा, नियमित ट्रेनिंग शुरू की और इस आर्ट से गहरा रिश्ता बना लिया। उन्हें लगता है कि बेली डांस उनके लिए कला से ज़्यादा आत्म-खोज है।
ऑनलाइन ट्रोलिंग और परिवार का unconditional सपोर्ट
लोगों ने कमेंट किए:
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“सारे कपड़े उतार कर डांस कर”
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“लड़की बनना है?”
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“सेक्स चेंज करवा लो”
पर घरवाले हमेशा ढाल बनकर खड़े रहे। यही वजह है कि तुषार आज मजबूती से अपने सपने पर टिके हुए हैं।
समाज की सोच और पुरुष बेली डांसर: सवाल जो पूछे जाने चाहिए
1. क्या डांस का कोई जेंडर होता है?
लोग अक्सर कहते हैं कि बेली डांस महिलाओं का होता है। सच ये है कि यह मध्य-पूर्व का क्लासिकल आर्ट है और इसे पुरुष भी करते रहे हैं।
2. क्यों लड़कियों की आज़ादी सराहना और लड़कों की आज़ादी मज़ाक बन जाती है?
राहुल कहते हैं—
“लड़कियां बाइक चलाएं तो वाहवाही। लड़के शेफ या डांसर बनें तो ताने।”
3. समाज नफरत तक क्यों पहुंच जाता है?
अभिषेक का हमला बताता है कि कभी-कभी लोग सिर्फ इसलिए हिंसक हो जाते हैं क्योंकि उनका सोचा हुआ “नॉर्मल” किसी की जिंदगी में फिट नहीं बैठता।
एक नज़र: तीनों कलाकारों की यात्रा (टेबल में)
| नाम | जन्मस्थान | बड़ी चुनौती | सबसे दर्दनाक घटना | आज की उपलब्धि |
|---|---|---|---|---|
| राहुल | मुंबई | परिवार और समाज की आलोचना | घर से निकाला जाना | इंटरनेशनल छात्रों को ट्रेनिंग |
| अभिषेक | हिमाचल | पुरुष बेली डांसर पर तंज | आठ लड़कों द्वारा हमला | इंफोसिस में फाइनेंशियल एडवाइज़र + डांसर |
| तुषार | कोलकाता | सोसाइटी का दबाव | सोशल मीडिया ट्रोलिंग | प्रोफेशनल बेली डांसर |
FAQ: अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. क्या बेली डांस सिर्फ महिलाओं का डांस है?
बिलकुल नहीं। मध्य-पूर्व में पुरुष भी सदियों से इसे करते आए हैं।
2. क्या पुरुष बेली डांसरों को ज्यादा ट्रोलिंग झेलनी पड़ती है?
हाँ, सामाजिक जेंडर स्टीरियोटाइप के चलते इन्हें अक्सर ताना, हिंसा और बदनामी झेलनी पड़ती है।
3. क्या इस डांस से करियर बनाया जा सकता है?
हाँ, आज कई पुरुष बेली डांसर इंटरनेशनल लेवल पर पढ़ा रहे हैं और शो कर रहे हैं।
4. क्या परिवार का सपोर्ट फर्क डालता है?
बहुत बड़ा। तुषार और राहुल जैसे कलाकार बताते हैं कि घर का साथ उन्हें खड़ा रखता है।
Conclusion: कला की कोई सीमा नहीं—लचक शरीर में नहीं, सोच में चाहिए
कहानियाँ जब दिल को छू लेती हैं, तो समाज अपने नियमों पर खुद सवाल उठाता है। राहुल, अभिषेक और तुषार किसी फिल्म के हीरो नहीं, बल्कि असली जिंदगी के वो कलाकार हैं जिन्होंने तिरस्कार का कड़वा पानी पीकर भी अपनी कला का पौधा सूखने नहीं दिया।
आज वे सिर्फ डांसर नहीं, बल्कि उम्मीद की मिसाल हैं। ये साबित करते हैं कि कमर की लचक से ज़्यादा ज़रूरी है सोच की लचक।
कला न तो औरत की होती है और न मर्द की — उसकी पहचान सिर्फ उसकी खूबसूरती है।