- 1922 की पेशावर आग की रात दिलीप कुमार का जन्म — अफरा-तफरी के बीच आया नया सितारा।
- किशोर उम्र में घर छोड़कर पुणे पहुँचे और ब्रिटिश कैंटीन में काम किया।
- येरवडा जेल में रात बिताई, गांधीवाले कैदियों से मुलाकात हुई।
- देविका रानी द्वारा दिया गया ऑफर बना उनके फिल्मी करियर का टर्निंग पॉइंट।
साल 1922 की कड़कड़ाती ठंड में पेशावर के किस्सा ख्वानी बाजार में लगी भयावह आग ने पूरे इलाके को दहला दिया था। तेज हवा, अंधेरी रात और हर तरफ भगदड़… माहौल ऐसा था कि किसी को यह अंदाजा भी नहीं था कि उसी अफरा–तफरी के बीच हिंदी सिनेमा के भविष्य के एक सुपरस्टार की एंट्री होने वाली है।
एक घर में अचानक प्रसव पीड़ा बढ़ी और ज्यादातर मर्द आग बुझाने में लगे थे। देवर उमर किसी तरह दाई को लेकर आया और गली में फैली दहशत के बीच एक गुलाबी, स्वस्थ, मजबूत बच्चे ने जन्म लिया — यूसुफ खान, जिसे दुनिया आगे चलकर दिलीप कुमार के नाम से पहचानेगी।
दिलीप कुमार का सफर: किस्सा ख्वानी की गलियों से बॉलीवुड के शिखर तक
किशोर उम्र में घर से निकलने की कहानी
कहानी कुछ ऐसी है कि दिलीप कुमार और उनके पिता लाला गुलाम सरवर के बीच रिश्ते थोड़े तिक्त चल रहे थे। किसी बात पर गर्मागर्मी बढ़ी और गुस्से में युवा यूसुफ ने फैसला किया कि अब बस — घर छोड़ना ही समाधान है।
पुणे पहुँचकर उन्होंने एक ब्रिटिश आर्मी कैंटीन में सैंडविच बेचने का काम शुरू किया। अंग्रेजी अच्छी थी, तो प्रमोशन भी जल्दी हो गया। देखते ही देखते वह कैंटीन के मैनेजर बन बैठे।
कमाई अच्छी हुई और दो साल तक पैसों की पोटली भरने के बाद वह मुंबई लौट आए।
छोटी-सी हंसी वाली बात:
कई लोग घर छोड़कर कुछ समय तक बेमकसद घूमते रहते हैं। दिलीप साहब घर छोड़कर मैनेजर बन गए — यह भी कमाल का टैलेंट है!
येरवडा जेल में गुज़री रात — और वह “गांधीवाला” नाम
ब्रिटिश क्लब में काम करते हुए एक दिन बातचीत छिड़ी कि भारत युद्ध में तटस्थ क्यों है।
यूसुफ ने संविधान की अपनी पढ़ाई के आधार पर इतनी दमदार दलीलें रखीं कि अफसरों ने अगले दिन पब्लिक स्पीच देने को कह दिया।
स्पीच शानदार रही, तालियाँ खूब बजीं —
लेकिन ब्रिटिश पुलिस खुश नहीं हुई, और तालियों की गूंज के बीच यूसुफ को उठा ले गई। सीधे येरवडा जेल पहुँचा दिया गया।
वहाँ उन्होंने शांत स्वभाव के सत्याग्रहियों वाली एक कोठरी में रात बिताई। जेलर ने उन्हें देखते ही कहा:
“अरे गांधीवाले, अंदर बैठो!”
यूसुफ खुद हैरान थे —
अभी तक तो वो सिर्फ सैंडविच बना रहे थे, अचानक गांधीवाले भी बना दिए गए!
टर्निंग पॉइंट: मुंबई स्टेशन पर लगी लाइन और किस्मत की ट्रेन
चर्चगेट स्टेशन पर खड़े दिलीप कुमार सुबह की ठंडी हवा में परेशान खड़े थे। घर की जिम्मेदारियाँ और असफल कोशिशों का बोझ किसी भारी ट्रंक जैसा कंधों पर टिका हुआ था। उसी समय उनकी मुलाकात डॉ. मसानी से हो गई, जिन्होंने कहा:
“मैं बॉम्बे टॉकीज जा रहा हूँ, तुम भी चलो… शायद कोई काम मिल जाए।”
बस फिर क्या था, यूसुफ ने दादर वाली ट्रेन छोड़कर किस्मत वाली ट्रेन पकड़ ली।
वहाँ देविका रानी से मुलाकात हुई। कुछ सवाल पूछे गए —
“उर्दू आती है?”
“पेशावर के हो?”
“एक्टिंग कर लोगे?”
और तुरंत ऑफर मिला —
1250 रुपए महीने का!
घर में सवाल उठा कि इतनी बड़ी रकम महीने की है या साल की।
राज कपूर की तनख्वाह 170 रुपए सुनकर सब और उलझ गए।
अगले दिन पूछताछ की गई और महीना ही कन्फर्म हुआ।
यही वह पल था जिसने भारतीय सिनेमा को एक नया सितारा दिया।
पहली फिल्म और पिता का गुस्सा
“स्टार” बने बेटे का पोस्टर देख पिता हैरान
फिल्म जुगनू 1947 में रिलीज हुई और पहली बड़ी हिट साबित हुई।
एक सुबह बशेश्वरनाथ कपूर, जो कपूर खानदान के बुज़ुर्ग थे, लाला गुलाम सरवर से बोले:
“चलो तुम्हें कुछ दिखाता हूँ।”
क्रॉफर्ड मार्केट पर लगे बड़े पोस्टर पर लिखा था:
“A New Star Is Born – DILIP KUMAR”
लाला साहब कुछ पल तक पोस्टर देखते रह गए।
चेहरा बेटे का…
नाम किसी और का।
और काम वही “नौटंकी”, जिसे वह हमेशा तंज में कहते थे।
कई दिनों तक उन्होंने बेटे से बात नहीं की।
घर में एक मौन-युद्ध चल रहा था — बिना तलवारों का, लेकिन चोट गहरी।
पृथ्वीराज कपूर ने बहुत मेहनत से माहौल सामान्य करवाया।
आखिरकार एक शाम पिता ने कहा:
“तुमने जो रास्ता चुना है, वो तुम्हारा अपना है।”
यही वह रात थी जब दिलीप कुमार को लगा कि पिता ने उन्हें स्वीकार कर लिया है।
पिता ने समझ लिया कि नरगिस ही थी असली प्रेमिका!
फिल्म मेला देखने के बाद दिलीप कुमार के पिता गंभीर मुद्रा में बैठे थे।
उन्होंने बेटे को बुलाया और बोला:
“अगर तुम उस लड़की से शादी करना चाहते हो, तो मैं उससे बात कर लूँ?”
यूसुफ एक पल के लिए समझ ही नहीं पाए कि पिता किस लड़की की बात कर रहे हैं।
चाचा उमर मुस्करा रहे थे और उन्होंने नाम बताया…
नरगिस!
यूसुफ भीतर ही भीतर हँस पड़े।
उन्हें लगा कहीं पिता सच में रिश्ता लेकर न पहुँच जाएँ, इसलिए जल्द ही साफ करना पड़ा कि यह तो फिल्म का किरदार है, असल जिंदगी नहीं।
सायरा बानो से शादी और वह अनोखी भविष्यवाणी
शादी 1966 में हुई —
सायरा 22 साल की थीं, दिलीप कुमार 44।
कोयंबटूर में ज्योतिषी ने सालों पहले कहा था:
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शादी चालीस के बाद होगी
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दुल्हन उम्र में लगभग आधी होगी
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चांद जैसी गोरी
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बेहद खूबसूरत
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फिल्मों से जुड़ी
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पति के कर्मों का बोझ भी चुपचाप सहेगी
दिलीप कुमार ने तब हँसकर कहा था:
“मैं कभी फिल्म वाली लड़की से शादी नहीं करूँगा।”
लेकिन किस्मत की डायरेक्शन किसी और के हाथ में थी।
ज्योतिषी की सारी बातें सच निकल आईं।
कहानी को आसान समझने के लिए एक छोटी तालिका
| विषय | विवरण |
|---|---|
| जन्म | 11 दिसंबर 1922, पेशावर की आग वाली रात |
| असली नाम | यूसुफ खान |
| पहली नौकरी | ब्रिटिश कैंटीन, पुणे |
| पहली फिल्म | ज्वार भाटा (1944) |
| पहली बड़ी हिट | जुगनू (1947) |
| पत्नी | सायरा बानो |
| उपनाम | ट्रैजडी किंग |
कुछ रोचक बातें जो कम लोग जानते हैं
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पेशावर वाले घर की आग ने शायद सितारे की किस्मत भी थोड़ा गर्म कर दी थी।
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पिता हमेशा चाहते थे बेटा सरकारी अफसर बने, लेकिन बेटा फिल्मी पोस्टर पर मुस्कुरा रहा था।
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यूसुफ खान से दिलीप कुमार बनने का सफर किसी फिल्म की कहानी जैसा ही था।
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फिल्म इंडस्ट्री में उनका उर्दू उच्चारण, शालीनता और गंभीर अभिनय अलग पहचान रखते थे।
FAQs — अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
1. दिलीप कुमार का जन्म कैसे हालात में हुआ था?
पेशावर के किस्सा ख्वानी बाजार में भीषण आग लगी थी और उसी हंगामे में उनका जन्म हुआ।
2. उन्होंने पहली बार नौकरी कहाँ की थी?
पुणे की ब्रिटिश आर्मी कैंटीन में सैंडविच बनाने और बेचने का काम किया।
3. येरवडा जेल कैसे पहुँचे?
ब्रिटिश शासन पर खुले विचार रखने और भाषण देने के कारण पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया।
4. फिल्मों में कैसे आए?
मुंबई स्टेशन पर डॉ. मसानी से मुलाकात और देविका रानी का ऑफर उनकी एंट्री का कारण बना।
5. पिता को कब पता चला कि उनका बेटा एक्टर बन गया है?
फिल्म जुगनू के बड़े पोस्टर पर दिलीप कुमार की तस्वीर देखकर।
निष्कर्ष
किस्सा ख्वानी की आग में जन्मा यह बच्चा आगे चलकर हिंदी सिनेमा का अमर सितारा बना। संघर्ष, जिद, मेहनत और किस्मत — सबने मिलकर उनकी कहानी को खास बनाया।
दिलीप कुमार सिर्फ एक अभिनेता नहीं थे, बल्कि एक स्कूल थे, एक संवेदना थे, एक भाषा थे।
पेशावर से मुंबई तक का सफर लंबा जरूर था, लेकिन हर मोड़ पर एक नई कहानी छिपी हुई थी।