कोलकाता की सड़कों पर मंगलवार को एक अलग ही दृश्य दिखा। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, पार्टी महासचिव अभिषेक बनर्जी और हजारों कार्यकर्ता तृणमूल कांग्रेस (TMC) के झंडों के साथ मार्च करते नजर आए।
Special Intensive Revision (SIR) — या कहें Voter List Verification — के खिलाफ यह 3.8 किलोमीटर लंबी रैली थी।
- ममता बनर्जी ने कोलकाता में SIR के खिलाफ 3.8 किमी लंबा मार्च निकाला।
- देश के 12 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में वोटर लिस्ट वेरिफिकेशन शुरू।
- DMK ने SIR को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की।
- चुनाव आयोग ने कहा – कोई भी योग्य मतदाता सूची से नहीं छूटेगा।
यह विरोध ऐसे समय हुआ है जब Election Commission of India ने देश के 12 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में मतदाता सूची की विशेष समीक्षा प्रक्रिया शुरू की है। इनमें पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी जैसे राज्य भी शामिल हैं जहाँ 2026 में विधानसभा चुनाव होने हैं।
SIR क्या है और क्यों चर्चा में है?
स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी SIR का सीधा मतलब है — वोटर लिस्ट की गहन समीक्षा।
इस प्रक्रिया में हर राज्य के Booth Level Officer (BLO) घर-घर जाकर यह जांच करते हैं कि मतदाता का नाम सूची में है या नहीं, कोई डुप्लीकेट एंट्री तो नहीं, या कहीं मृत व्यक्तियों के नाम तो नहीं रह गए।
SIR का मकसद यह सुनिश्चित करना है कि
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योग्य मतदाता का नाम लिस्ट में बना रहे।
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अयोग्य या डुप्लीकेट नाम हटाए जाएँ।
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नई उम्र के युवा मतदाताओं को जोड़ा जा सके।
लेकिन इस बार SIR सिर्फ एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक राजनीतिक तूफ़ान बन गई है।
ममता बनर्जी का आरोप – “वोटर लिस्ट में धांधली हो रही है”
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का कहना है कि यह प्रक्रिया पारदर्शी नहीं है।
उनका आरोप है कि भाजपा सरकार और चुनाव आयोग मिलकर चुपचाप वोटर लिस्ट में हेराफेरी कर रहे हैं।
रैली के दौरान ममता ने कहा —
“वोट हमारी लोकतंत्र की ताकत है, और इस ताकत से खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं होगा।”
उनके साथ पार्टी महासचिव अभिषेक बनर्जी और हजारों कार्यकर्ता भी थे। यह रैली करीब 3.8 किलोमीटर लंबी थी और कोलकाता के प्रमुख मार्गों से होकर गुज़री।
विपक्ष का पलटवार – “यह रैली संविधान के खिलाफ”
राज्य विधानसभा में विपक्ष के नेता सुवेंदु अधिकारी ने ममता की रैली को “जमात की रैली” बताते हुए कहा कि यह भारतीय संविधान की नैतिकता के खिलाफ है।
वहीं बंगाल भाजपा अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य ने कहा —
“अगर ममता जी को SIR से कोई आपत्ति है, तो वे सुप्रीम कोर्ट जाएँ, सड़क पर नहीं।”
राजनीतिक बयानबाज़ी तेज़ है, और बंगाल में चुनाव से पहले यह मुद्दा एक नया सियासी मोर्चा बन गया है।
देश के 12 राज्यों में शुरू हुआ SIR
चुनाव आयोग ने मंगलवार से देश के 12 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में SIR की शुरुआत की। ये राज्य हैं —
| क्रमांक | राज्य / केंद्रशासित प्रदेश |
|---|---|
| 1 | अंडमान और निकोबार |
| 2 | छत्तीसगढ़ |
| 3 | गोवा |
| 4 | गुजरात |
| 5 | केरल |
| 6 | लक्षद्वीप |
| 7 | मध्य प्रदेश |
| 8 | पुडुचेरी |
| 9 | राजस्थान |
| 10 | तमिलनाडु |
| 11 | उत्तर प्रदेश |
| 12 | पश्चिम बंगाल |
इन 12 राज्यों में कुल 51 करोड़ वोटर हैं। इस काम में 5.33 लाख BLO और 7 लाख से ज्यादा BLA (Booth Level Agents) शामिल होंगे।
DMK भी सुप्रीम कोर्ट पहुँची
तमिलनाडु में सत्तारूढ़ DMK पार्टी ने SIR प्रक्रिया को लेकर सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया है।
DMK का आरोप है कि यह प्रक्रिया मतदाताओं के अधिकारों पर असर डाल सकती है।
DMK नेता आर. एस. भारती ने पार्टी सांसद और वरिष्ठ वकील एन. आर. एलंगो के माध्यम से याचिका दायर की।
मुख्यमंत्री एम. के. स्टालिन की अध्यक्षता में हुई दलों की बैठक में तय हुआ कि सुप्रीम कोर्ट से ही इस पर न्यायिक राय ली जाएगी।
असम में सबसे जटिल स्थिति
असम में नागरिकता और वोटर लिस्ट का मामला सबसे पेचीदा है।
चुनाव आयोग ने कहा कि असम के लिए अलग SIR मॉडल तैयार किया जाएगा क्योंकि वहाँ नागरिकता से जुड़े विवाद अब भी जारी हैं।
असम में नागरिकता का इतिहास
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1971 के भारत–बांग्लादेश युद्ध के दौरान कई शरणार्थी असम आए।
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1985 में हुए असम समझौते में तय हुआ कि 1971 के बाद आए लोगों को वापस भेजा जाएगा।
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इसके बाद 1971 से 1987 के बीच जन्मे लोगों की नागरिकता पर उलझन बनी रही।
1997 में चुनाव आयोग ने “D Voters (Doubtful)” नाम की श्रेणी बनाई — यानी जिनकी नागरिकता संदिग्ध है, वे वोट नहीं डाल सकेंगे जब तक पुष्टि न हो जाए।
NRC और 19 लाख लोगों की सूची से कटौती
2005 से 2010 के बीच सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर NRC (National Register of Citizens) की प्रक्रिया शुरू हुई जो 2019 तक चली।
इसके तहत 19 लाख लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाने की सिफारिश हुई।
राजनीतिक विवाद के कारण यह प्रक्रिया अधूरी रह गई।
अब आयोग चाहता है कि SIR के दौरान असम में नागरिकता की जांच को फ़िलहाल टाला जाए और सिर्फ़ मतदाता सूची की तकनीकी समीक्षा की जाए।
BLO घर-घर जाकर करेंगे वेरिफिकेशन
4 नवंबर से BLO यानी Booth Level Officers घर-घर जाकर वोटर की जानकारी की पुष्टि करेंगे।
उनका मुख्य काम होगा —
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मतदाता के नाम की पुष्टि
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डुप्लीकेट एंट्री हटाना
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मृत मतदाताओं के नाम निकालना
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नए मतदाताओं को जोड़ना
यह प्रक्रिया 7 फरवरी तक चलेगी।
BLO को 28 अक्टूबर से 3 नवंबर तक ट्रेनिंग दी गई है।
SIR के लिए जरूरी दस्तावेज
मतदाता को अपनी पहचान साबित करने के लिए निम्न दस्तावेजों में से कोई एक देना होगा —
| मान्य दस्तावेज | उद्देश्य |
|---|---|
| पेंशनर पहचान पत्र | सरकारी प्रमाणपत्र |
| सरकारी विभाग द्वारा जारी ID | पहचान प्रमाण |
| जन्म प्रमाणपत्र | नागरिकता और आयु प्रमाण |
| पासपोर्ट / 10वीं की मार्कशीट | पहचान |
| स्थायी निवास प्रमाणपत्र | निवास प्रमाण |
| वन अधिकार या जाति प्रमाणपत्र | सामाजिक प्रमाण |
| NRC में नाम या परिवार रजिस्टर | नागरिकता प्रमाण |
| जमीन या मकान आवंटन पत्र | संपत्ति प्रमाण |
| आधार कार्ड | केवल पहचान के लिए (नागरिकता नहीं) |
नाम कटने या गलती होने पर क्या करें
अगर किसी का नाम ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से कट गया है तो घबराने की जरूरत नहीं।
आपको एक महीने के अंदर अपील का अधिकार है।
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पहले चरण में ERO (Electoral Registration Officer) के पास अपील करें।
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यदि वहाँ समाधान न मिले तो DM (जिला अधिकारी) के पास जाएँ।
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अंतिम अपील राज्य के CEO (Chief Electoral Officer) तक की जा सकती है।
SIR का असली मकसद
पिछली बार SIR प्रक्रिया 2004 में हुई थी। यानी 21 साल से कोई व्यापक समीक्षा नहीं हुई थी।
इस दौरान लोगों के माइग्रेशन, मृत्यु और स्थान परिवर्तन के कारण लिस्ट में बहुत बदलाव जरूरी हो गया था।
मुख्य उद्देश्य:
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डुप्लीकेट नाम हटाना।
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मृत मतदाताओं के नाम हटाना।
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नए पात्र मतदाताओं को जोड़ना।
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किसी विदेशी नागरिक का नाम लिस्ट में हो तो निकालना।
चुनाव आयोग का कहना – “कोई डरने की बात नहीं”
चुनाव आयोग ने सोमवार को मद्रास हाईकोर्ट में स्पष्ट किया कि SIR प्रक्रिया पारदर्शी है और किसी भी मतदाता के अधिकारों का हनन नहीं होगा।
सभी आपत्तियों और सुझावों पर विचार करने के बाद ही अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित की जाएगी।
आयोग का यह भी कहना है कि SIR को लेकर “राजनीतिक भ्रम” फैलाया जा रहा है जबकि यह एक सामान्य प्रक्रिया है।
Bihar voter list का विशेष महत्व
अगर कोई व्यक्ति 12 राज्यों में से किसी में नाम जुड़वाना चाहता है और उसके पास बिहार की SIR के बाद बनी वोटर लिस्ट की प्रति है, जिसमें उसके माता-पिता के नाम हैं,
तो उसे नागरिकता का अतिरिक्त प्रमाण नहीं देना होगा — केवल जन्म तिथि का प्रमाण पर्याप्त रहेगा।
आधार कार्ड पर स्पष्टीकरण
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद चुनाव आयोग ने कहा है कि
आधार कार्ड को केवल पहचान प्रमाण के रूप में स्वीकार किया जाएगा,
नागरिकता प्रमाण के रूप में नहीं।
इसका मतलब यह है कि आधार होने से आप मतदाता बन सकते हैं,
लेकिन यह साबित नहीं करता कि आप “भारतीय नागरिक” हैं।
SIR से जुड़े कुछ सवाल-जवाब (FAQ)
1. SIR कब तक चलेगा?
→ यह प्रक्रिया 4 नवंबर 2025 से शुरू होकर 7 फरवरी 2026 तक चलेगी।
2. कौन-कौन से राज्य शामिल हैं?
→ 12 राज्य और केंद्रशासित प्रदेश — पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल, पुडुचेरी, यूपी, राजस्थान, एमपी, गुजरात, गोवा, छत्तीसगढ़, अंडमान निकोबार, लक्षद्वीप।
3. अगर नाम लिस्ट में नहीं है तो क्या करें?
→ फॉर्म भरें, जरूरी दस्तावेज दें, और BLO से पुष्टि करवाएँ।
4. दो जगह नाम है तो क्या होगा?
→ एक जगह से नाम हटवाना होगा। दोहरी एंट्री अपराध मानी जाती है।
5. क्या यह नागरिकता की जांच है?
→ नहीं, सिवाय असम के, जहाँ नागरिकता से जुड़े प्रावधान अलग हैं।
6. BLO कौन होते हैं?
→ BLO यानी Booth Level Officer — चुनाव आयोग के प्रशिक्षित अधिकारी जो घर-घर जाकर वोटर डेटा की जांच करते हैं।
7. क्या SIR राजनीतिक प्रभाव में किया जा रहा है?
→ विपक्षी दलों का आरोप है कि प्रक्रिया पारदर्शी नहीं है, लेकिन आयोग ने इसे “कानूनी और निष्पक्ष” बताया है।
राजनीतिक और सामाजिक असर
SIR जैसी प्रक्रिया तकनीकी रूप से चुनावी शुद्धता के लिए होती है,
लेकिन भारत जैसे विविध देश में यह राजनीतिक हथियार भी बन जाती है।
बंगाल में ममता बनर्जी का रुख दिखाता है कि राज्य सरकारें अब
चुनाव आयोग की हर पहल को राजनीतिक दृष्टि से देखने लगी हैं।
वहीं, विपक्ष इसे लोकतंत्र की रक्षा का कदम बता रहा है।
नतीजतन, एक साधारण प्रशासनिक प्रक्रिया
राजनीतिक बहस का केंद्र बन गई है।
संभावित प्रभाव: भविष्य की राजनीति पर असर
| पक्ष | संभावित प्रभाव |
|---|---|
| ममता बनर्जी | TMC के जनाधार को मजबूत करने का प्रयास |
| भाजपा | विपक्षी आरोपों का सामना और सफाई की रणनीति |
| चुनाव आयोग | पारदर्शिता साबित करने की चुनौती |
| आम मतदाता | दस्तावेज़ी झंझट और जागरूकता की ज़रूरत |
थोड़ा हास्य भी सही – “वोटर लिस्ट की कहानी, पहचान की निशानी”
कोलकाता की गर्म दोपहरी में ममता दीदी का मार्च देखकर एक बुजुर्ग बोले —
“हम तो वोटर लिस्ट में नाम देखते-देखते बूढ़े हो गए, अब वोटर लिस्ट खुद जवान हो रही है!”
शायद यही भारतीय लोकतंत्र की खूबसूरती है —
जहाँ वोटर लिस्ट भी हर पांच साल में मेकओवर करवाती है।
निष्कर्ष (Conclusion)
SIR यानी Special Intensive Revision एक प्रशासनिक प्रक्रिया है,
लेकिन इसके राजनीतिक मायने कहीं ज़्यादा गहरे हैं।
ममता बनर्जी का विरोध यह दिखाता है कि मतदाता सूची जैसी तकनीकी चीज़ें भी
लोकतंत्र के सबसे बड़े विमर्श का हिस्सा बन सकती हैं।
देश के 12 राज्यों में शुरू हुई यह प्रक्रिया आने वाले चुनावों का पहला संकेतक हो सकती है।
अब देखना यह है कि क्या SIR सिर्फ़ एक लिस्ट अपडेट करने की प्रक्रिया रह जाती है,
या फिर यह नई राजनीतिक बहस का कारण बनती है।