बिहार की राजनीति में हमेशा एक कहावत चलती है — “वोटिंग बढ़े, तो कुर्सी डोले।” और इस बार तो वोटिंग ने 2020 की तुलना में 9.61% की लंबी छलांग लगा दी है। यानी कुल 66.6% लोगों ने वोट डाला। अब सवाल उठता है कि क्या यह बढ़ी हुई वोटिंग नीतीश कुमार की सरकार को फिर से बचाएगी या महागठबंधन के तेजस्वी यादव को मौका देगी?
एग्जिट पोल (exit poll Bihar 2025) के मुताबिक, इस बार तो NDA के खाते में साफ़-सुथरा बहुमत दिख रहा है। 17 एजेंसियों के पोल ऑफ पोल्स में NDA को 154 सीटों का अनुमान है, जबकि महागठबंधन 84 पर सिमटता दिख रहा है। बाकियों को बस चाय पीने लायक सीटें मिली हैं — करीब 5।
इतिहास बोलता है: 5% बढ़े वोटिंग तो सरकार बदली
बिहार के चुनावी इतिहास को अगर चाय की तरह उबालें, तो चार बार ऐसा हुआ है जब 5% से ज्यादा वोटिंग बढ़ी या घटी, और सरकार बदल गई।
देखिए नीचे की छोटी-सी झलक —
| वर्ष | वोटिंग में अंतर | सत्ता परिवर्तन | किसकी सरकार गई | नई सरकार बनी |
|——|—————-|—————-|—————-|
| 1967 | +7% | हाँ | कांग्रेस | गैर-कांग्रेसी गठबंधन |
| 1980 | +6.8% | हाँ | जनता पार्टी | कांग्रेस |
| 1990 | +5.8% | हाँ | कांग्रेस | जनता दल (लालू यादव) |
| 2005 | -16.1% | हाँ | RJD | नीतीश कुमार (NDA) |
इतना तो तय है कि बिहार में जब जनता ज़रा ज़्यादा जोश में वोट देती है, तो कुर्सी किसी न किसी का हिल ही जाती है।
1951 से अब तक: वोटिंग और सत्ता का खेल
बिहार में आज़ादी के बाद से 16 विधानसभा चुनाव माने जाते हैं। हाँ, फरवरी 2005 वाला चुनाव छोड़ दीजिए — वहाँ तो कोई सरकार बनी ही नहीं। नतीजे ऐसे टेढ़े-मेढ़े आए कि आठ महीने बाद फिर चुनाव करवाने पड़े।
अब तक के ट्रेंड बताते हैं कि 60% से ज्यादा वोटिंग हो तो लालू-राबड़ी को फायदा, और 60% से कम हो तो नीतीश कुमार की मुस्कान चौड़ी हो जाती है।
जब बढ़ी वोटिंग और बदला बिहार का इतिहास
1967: पहली बार गैर-कांग्रेसी सरकार
1967 में वोटिंग 7% बढ़ी थी। कांग्रेस की नींव हिली और महामाया प्रसाद सिन्हा की अगुवाई में पहली गैर-कांग्रेसी सरकार बनी। पर यह सरकार चली उतनी ही देर जितनी देर तक छाछ ठंडी रहती है — यानी ज़्यादा नहीं। कांग्रेस की वापसी होती रही, लेकिन उस चुनाव ने उसके “सुनहरे युग” का सूर्यास्त कर दिया।
1980: कांग्रेस की वापसी
1980 में मतदान में 6.8% की बढ़त हुई। जनता पार्टी की अंदरूनी लड़ाइयों ने कांग्रेस के लिए रास्ता साफ कर दिया। जगन्नाथ मिश्र मुख्यमंत्री बने और कांग्रेस ने फिर तिरंगा फहराया। लेकिन अंदर की राजनीति ने 10 साल में ही कांग्रेस की नाव डुबो दी।
1990: लालू यादव की एंट्री और मंडल की आंधी
1990 में 5.8% ज्यादा वोटिंग हुई। जनता दल ने कांग्रेस को बाहर का रास्ता दिखा दिया और लालू यादव बिहार की राजनीति में छा गए। लालू ने नारा दिया — “भूरा बाल साफ करो” और फिर 15 साल तक सत्ता उनकी जेब में रही।
कांग्रेस तब से अब तक वापसी का रास्ता ही ढूंढ रही है।
2005: कम वोटिंग, लेकिन बड़ा बदलाव
2005 में मतदान 16.1% घट गया, पर सत्ता की गाड़ी RJD से उतरकर नीतीश कुमार की सीट पर जा बैठी। यह चुनाव “सुशासन बाबू” के उदय का प्रतीक बना। कम वोटिंग का मतलब उदास जनता नहीं, बल्कि बदलाव का संकेत था।
हाल के 35 साल: वोटिंग का खेल और कुर्सी का हिसाब
2005 से अब तक 7 विधानसभा चुनाव हुए हैं। इनमें दिलचस्प पैटर्न दिखा —
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जब भी वोटिंग 60% से ज्यादा हुई, राबड़ी-लालू की पार्टी ने बाजी मारी।
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जब वोटिंग 60% से कम रही, नीतीश कुमार की सरकार बनी या टिकी रही।
देखिए आसान चार्ट —
| वर्ष | वोटिंग प्रतिशत | जीतने वाला दल | मुख्यमंत्री |
|---|---|---|---|
| 1990 | 62% | जनता दल | लालू यादव |
| 1995 | 61.79% | RJD | लालू यादव |
| 2000 | 62.57% | RJD+कांग्रेस | राबड़ी देवी |
| 2005 (अक्टूबर) | 46.5% | NDA | नीतीश कुमार |
| 2010 | 52.7% | NDA | नीतीश कुमार |
| 2015 | 56.9% | महागठबंधन | नीतीश कुमार |
| 2020 | 57.29% | NDA | नीतीश कुमार |
अब 2025 में वोटिंग 66.6% तक जा पहुंची है — यानी आंकड़ा फिर 60% से ऊपर। इतिहास कहता है कि यह लालू परिवार के लिए शुभ संकेत होता है, लेकिन एग्जिट पोल कुछ और कहानी सुना रहे हैं।
इस बार वोट क्यों बढ़ा?
1. महिलाओं की ताकत
नीतीश कुमार की सरकार ने चुनाव से पहले ही महिला रोजगार योजना के तहत 1.21 करोड़ महिलाओं को ₹10,000 की राशि दी। उधर तेजस्वी यादव ने वादा किया कि अगर सरकार बनी तो महिलाओं को हर साल ₹30,000 देंगे।
अब बताइए, इतनी बड़ी रकम के वादों पर कौन घर बैठा रहता! महिलाएं भारी संख्या में बूथ तक पहुंचीं और वोटिंग रेट बढ़ गया।
2. SIR और वोट चोरी का मुद्दा
पॉलिटिकल एनालिस्ट अरविंद मोहन का मानना है कि इस बार “SIR” यानी Systemic Irregularity Report और “वोट चोरी” के आरोपों ने पिछड़ा और अति-पिछड़ा वोटर को जोश में ला दिया। उन्होंने कहा —
“महागठबंधन ने वोट चोरी को बड़ा मुद्दा बनाया, जिससे ग्रामीण इलाकों में मतदान बढ़ा।”
दूसरी ओर सीनियर जर्नलिस्ट अभिरंजन कुमार का कहना है कि यह “गिनती का खेल” भी हो सकता है।
“65 लाख मृत मतदाताओं के नाम हटने से प्रतिशत बढ़ गया। वोट तो उतना ही पड़ा जितना हर बार पड़ता है।”
3. प्रशांत किशोर की जनसुराज पार्टी
पहली बार मैदान में उतरे प्रशांत किशोर (PK) और उनकी जनसुराज पार्टी ने लोगों में नई उम्मीद जगाई। हालांकि एग्जिट पोल में पार्टी को 3 से 5 सीटों का अनुमान है, लेकिन उन्होंने बहस तो छेड़ ही दी। पॉलिटिकल एनालिस्ट पवन कोराडा कहते हैं —
“जनसुराज का असर सीटों पर भले कम दिखे, लेकिन वोटिंग में जोश जरूर बढ़ा।”
4. छठ पर्व का टाइमिंग फैक्टर
इस बार वोटिंग छठ पर्व के बाद हुई। बड़ी संख्या में बिहारवासी जो बाहर काम करते हैं, वे त्योहार के लिए घर आए थे और वोट डालकर ही लौटे।
महागठबंधन और जनसुराज दोनों ने अपील भी की थी — “छठ मनाइए, लेकिन वोट देकर जाइए।”
नतीजा — पोलिंग बूथों पर लंबी लाइनें और 9.6% ज्यादा मतदान।
एग्जिट पोल के नतीजे: कौन आगे, कौन पीछे
| गठबंधन | अनुमानित सीटें | पिछली बार की सीटें | लाभ/हानि |
|---|---|---|---|
| NDA | 154 | 125 | +29 |
| महागठबंधन | 84 | 110 | -26 |
| अन्य | 5 | 8 | -3 |
| जनसुराज | 3-5 | – | नई एंट्री |
यह साफ है कि NDA को फायदा हो रहा है, जबकि महागठबंधन पिछड़ता दिख रहा है। हालांकि, बिहार के इतिहास को देखते हुए कोई भी यह नहीं कह सकता कि वोटिंग के बढ़ने का मतलब हमेशा सत्ता की वापसी है या परिवर्तन।
क्या इतिहास फिर दोहराएगा खुद को?
9.6% ज्यादा वोटिंग हुई है — यानी इतिहास के पैटर्न के मुताबिक सत्ता बदलनी चाहिए। लेकिन नीतीश कुमार का ट्रैक रिकॉर्ड कहता है कि जब वोटिंग कम या ज़्यादा, दोनों ही हो, वे कुर्सी संभाल ही लेते हैं।
कुछ राजनीतिक विश्लेषक मज़ाक में कहते हैं,
“नीतीश कुमार बिहार की राजनीति के UPS हैं — लाइट जाए या आए, वे हमेशा ऑन रहते हैं।”
जनता की राय: इस बार मुद्दे क्या रहे
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महिलाओं की सुरक्षा और नौकरी
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बेरोजगारी और पलायन
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मंहगाई और बिजली-पानी की समस्या
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‘सुशासन’ बनाम ‘परिवर्तन’ की बहस
यानी चुनावी मैदान में मुद्दे तो पुराने थे, बस चेहरे और नारे नए।
FAQ: लोगों के मन में उठते सवाल
Q1. क्या बढ़ी हुई वोटिंग से सत्ता बदलेगी?
संभावना है, लेकिन गारंटी नहीं। इतिहास कहता है कि 5% से ज्यादा वोटिंग बदलने पर 4 बार सरकार बदली है।
Q2. NDA को कितनी सीटों का अनुमान है?
पोल ऑफ पोल्स में NDA को 154 सीटें मिलने का अनुमान है।
Q3. जनसुराज पार्टी का क्या हाल है?
प्रशांत किशोर की जनसुराज को 3-5 सीटें मिल सकती हैं। प्रभाव कम पर चर्चा ज़्यादा है।
Q4. वोटिंग इतनी क्यों बढ़ी?
महिला योजनाएं, वोट चोरी का मुद्दा, छठ पर्व और नए चेहरों की एंट्री – सबने मिलकर इस बार का चुनाव ज़्यादा रोमांचक बना दिया।
निष्कर्ष: बिहार का मूड तो बदला, पर सरकार?
इतिहास कहता है कि वोटिंग बढ़ने पर बिहार में सत्ता पलट जाती है। लेकिन नीतीश कुमार की राजनीति इतिहास से ज़्यादा “जुगाड़” में यकीन रखती है।
इस बार 9.6% बढ़ी वोटिंग ने तो माहौल गरमा दिया है, पर असली फैसला तो EVM के पेट में है।
जो भी हो, बिहार की राजनीति फिर एक बार “क्लाइमेक्स” पर पहुंच गई है —
NDA मुस्कुरा रहा है, महागठबंधन आशा में है, और जनता बस यही सोच रही है —
‘अबकी बार सरकार बने या बदले, बिजली-पानी और सड़के तो सुधरें!’